Friday, September 2, 2016



रफ़्ता -रफ़्ता 

रफ़्ता-रफ़्ता जल रहा है दिल ,
ये आग कैसा है,
बिखरी पड़ी हैं कोंपलें,
ये गुलाब कैसा है ,
बार-बार टूट जाता है बिखरकर ,
आखिर 
ये ख़्वाबकैसा है ,
सितारे बेवफ़ा हो गये क्या ?
जरा पूछो तो ,
माहताब कैसा है ,
ये नूर जो बार-बार छेड़ रहा है मुझको ,
जरा पता तो करो ,
 ये आफ़ताब कैसा है,
जरा बेहोश क्या हुए ,सब खलने लगे मुझसे ,
खुद ही पिलाकर पूछते है , सितमगर ,
ये शराब कैसा है||

(मयंक आर्यन)

No comments: