my shayri
Tuesday, February 24, 2015
"विहग गण पूछते हमसे बताओ बात कैसी है.
बहुत मचले हो तुम दिन को, सहज अब रात कैसी है ,
निखर है चांदनी फिर भी , हो मायूस इतना क्यों?
लिए परियों सी सुन्दरता तुम्हारी चाँद कैसी है ...."
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